देदपुरा और दौलतपुरा के 72 घरों में 160 विधवाएं, कारण- सिलिकोसिस, 187 कर रहे मौत का इंतजार

Dainik Bhaskar | Jan 20, 2020

  • ब्यावर और इसके आसपास के गांवों में पत्थरों के काम से जुड़े परिवारों की स्थिति दयनीय
  • राज्य सरकार ने बीमारी के खिलाफ नीति तो जारी की, सार्थक इलाज सामने नहीं आ सका

ब्यावर | राज्य सरकार ने सत्ता में आने के बाद अपना चुनावी वादा निभाते हुए नई सिलिकोसिस नीति तो जारी कर दी, मगर राज्य के एक बड़े इलाके में रोजी-रोटी के साथ जुड़ी इस जानलेवा बीमारी के धीमे जहर का कोई सार्थक इलाज अब तक सामने नहीं आ पाया है। हालात शायद सरकार की सोच से ज्यादा खतरनाक हैं।

ब्यावर और इसके आस-पास के ग्रामीण इलाकों में पत्थरों के काम से जुड़े परिवारों की पड़ताल की तो दिल दहला देने वाली तस्वीर सामने आई। मसूदा के दो गांवों देदपुरा और दौलतपुरा में 72 घरों की बस्ती में 200 परिवार रहते हैं…और इनमें से 160 महिलाओं की मांग सिलिकोसिस ने उजाड़ दी है। यही नहीं, इस इलाके से 187 लोग सिलिकोसिस के लिए पॉजीटिव पाए जा चुके हैं। यानी ये भी धीमी मौत का इंतजार कर रहे हैं। ज्यादा कड़वी सच्चाई ये है कि ये परिवार दो वक्त की रोटी के लिए अपनी अगली पीढ़ी को भी उसी काम में धकेलने के लिए मजबूर हैं, जिसने उनके अपनों को मौत दी।

सालों से हो रहा पत्थर का काम
आश्चर्य की बात है कि इस क्षेत्र से लोग सालों से बिजोलिया और आसपास में कार्य कर रहे हैं लेकिन सिलिकोसिस का पहला प्रमाण पत्र ही इस क्षेत्र में 2016 में जारी हुआ। दौलतपुरा द्वितीय क्षेत्र से अभी भी करीब 400 लाेग वर्तमान में भी उन्हें खदानों में मजदूरी कर रहे हैं जहां उनके पिता या दादा मजदूरी करते थे। इस क्षेत्र में 129 लोगों को सिलिकोसिस की पुष्टि हो चुकी है आैर सार्टिफिकेट जारी होने के बाद 25 लोगों की मौत हो चुकी है।

कई युवाओं का वजन बच्चों से भी कम
ब्यावर और मसूदा उपखंड में सैकड़ों मजदूरों की त्रासदी यह है कि पेट पालने के लिए पत्थर तोड़ना उनकी मजबूरी है और वही पत्थर उनकी सांसों में घुलकर उन्हें मौत की ओर धकेल रहा है। दोनों उपखंड में 1 हजार से ज्यादा खान और रीको फैक्ट्रियों के मजदूर हैं। इनमें से ज्यादातर सांस की बीमारी, टीबी और सिलिकोसिस जैसी जानलेवा बीमारी से ग्रसित हैं। खदानों में काम करने वाले मजदूरों की मौत का सिलसिला लगातार बढ़ता ही जा रहा है। उसके बावजूद विडंबना यह है कि उन्हें खुद को सिलिकाेसिस का शिकार साबित कराने के लिए भी मशक्कत करनी पड़ती है। कई गांव ऐसे हैं जहां हर दिन कोई न कोई मजदूर काल का ग्रास बनता है। कई लोगों का वजन बच्चों से भी कम हो गया है।

देदपुरा में 300 की मौत हो चुकी

भीलवाड़ा के बिजौलिया और ब्यावर के रीको क्षेत्र में मजदूरी करने आने वाले ब्यावर और मसूदा उपखंड के 8 गांवों के सैकड़ों युवा इस बीमारी की चपेट में हैं। इन गांवों में 50 से लेकर 150 परिवार ऐसे हैं जिनके मुखिया काल का ग्रास बन चुके हैं तो कई ऐसे भी हैं जो पलंग पर पड़े मौत का इंतजार कर रहे हैं। देवास देदपुरा में वर्तमान में करीब 300 लोगों की मौत हो चुकी है जो पत्थरों के काम से जुड़े थे। इनमें से कई की तो जांच ही नहीं हो सकी और टीबी का इलाज लेते हुए इनकी मौत हो गई। महज 58 लोगों को ही सिलिकोसिस का सार्टिफिकेट मिल सका। 700 से ज्यादा श्रमिक इस क्षेत्र में सिलिकोसिस के संदिग्ध हैं। 152 तो अभी भी जांच के इंतजार में हैं।

ड्राफ्ट में 4000 थी पेंशन, नीति बनी तो 1500 रह गई
सरकार ने सिलिकोसिस पीड़ितों के लिए कार्य करने वाली संस्थाओं व अन्य अफसरों के साथ विचार-विमर्श के बाद जो पॉलिसी ड्राफ्ट की थी उसमें सिलिकोसिस पीड़ितों को 5 लाख रुपए का मुआवजा और 4 हजार रुपए जीविकोपार्जन के लिए तथा सिलिकोसिस पीड़ित की मृत्यु के बाद उसके आश्रित को 3 हजार 500 रुपए पेंशन दिए जाने का प्रस्ताव था। मगर जब नीति आई तो सिलिकोसिस पीड़ितों को विशेष योग्यजन में शामिल करते हुए महज 1500 रुपए प्रतिमाह पेंशन की स्वीकृति जारी की गई है।

“सरकार के जो निर्देश मिलते हैं उनकी पालना हम एंश्योर करते हैं। हम जांच के मामले ज्यादा लंबित नहीं रखते। जो लंबित हैं वे अलग-अलग स्टेजेज में हैं। फैक्ट्रियों व श्रमिकों के अन्य कार्यस्थलों की भी समय-समय पर जांच करवाई जाती है। -विश्वमोहन शर्मा, कलेक्टर, अजमेर”